आज अज्ञेय जी के 111वें जन्मदिवस पर उनको श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं।
अज्ञेय कहते हैं “परिचय प्राप्त करने के लिए अधिक बोलने की ज़रूरत नहीं है, वह तो मुस्करा भर देने से हो जाता है।”
ऐसा निष्छल व्यक्तव्य कोई और दे ही नहीं सकता था।
यद्यपि गद्य और पद्य दोनों में उन्हें महारत हासिल थी, और दोनों विधाओं में उन्होंने नए आयाम कायम किए, लेकिन मेरा परिचय उनसे उनकी कविताओं में हुआ। मुझे हिंदी कविताओं की ओर मोड़ने वालों में वह अग्रणी थे।
बचपन में अधिकांश कविताएं या तो साधारण तुकबंदी होती थीं, अथवा बहुत ही बोरिंग। ऐसे में साँप जैसी कविता का आगमन हुआ और कविता के प्रति मेरा दृष्टिकोण बदल गया।
साँप !
तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना
भी तुम्हें नहीं आया।
एक बात पूछूँ–(उत्तर दोगे?)
तब कैसे सीखा डँसना–
विष कहाँ पाया?